हा हा मैं सब भाँति विगारी - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (4)

हा हा मैं सब भाँति विगारी - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (4)

(राग भैरवी वा ईमन)
हा हा मैं सब भाँति विगारी॥ टेक॥
मेट मेंड श्रुतिशास्त्र लाज जग, कुलकी कान सकल निरवारी॥ [1]
उक-चूक सब क्षमहु किशोरी, चित्त न धरो मौ औगुन भारी॥
ललित लड़ैती देह बास ब्रज, ज्यों-त्यों पुरिवौ आसा प्यारी॥ [2]

- श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (4)

मैंने सब प्रकार से बिगाड़ ली है । मैंने वेद-शास्त्रों की मर्यादा, संसार की लाज, और कुल की मान-मर्यादा, सभी का त्याग कर दिया है। [1]

हे किशोरीजी! कृपया मेरी सभी भूल-चूकों को क्षमा कर दें, मेरे भारी दोषों पर ध्यान न दें। श्री ललित लड़ैती कहते हैं, “मेरी यह एकमात्र इच्छा है कि मैं ब्रज में निवास करूं और आप, हे प्यारी! किसी न किसी प्रकार मेरी यह अभिलाषा पूरी करें क्योंकि मेरी एकमात्र आशा अब आपसे ही है।” [2]