(राग केदारो)
लालन गिरिधारी नवल कुंजबिहारी।
अंग अंग पर मनमथ कोटिक वार डारी॥ [1]
संग नवल नारी वृषभानु की दुलारी।
सुरति केलि अंग अंग सुखकारी॥ [2]
ग्रथित बेनी पियारी चंपक जाति निवारी।
परसत उर पुलकित भरत अंकवारी॥ [3]
कंठ सुघर भारी मधुर तान संचारी।
दंपति राग रंग राख्यो 'गोविंद' बलि बलिहारी॥ [4]
- श्री गोविन्द स्वामी, श्री गोविन्द स्वामी जी की वाणी
गिरधारी लाल कुंजबिहारी श्री कृष्ण इतने सुन्दर हैं की उनके अंग-अंग पर करोड़ों कामदेव न्योंछावर हैं। [1]
उनके संग वृषभानु दुलारी नवल किशोरी श्री राधा विराजमान हैं एवं उनकी सुरत केलि लीला में दोनों के अंग-अंग सुख की वर्षा कर रहे हैं। [2]
प्रिया जू की सुन्दर वेणी चम्पक पुष्पों से ग्रन्थित है, एवं उनके स्पर्श से पुलकित भये श्री श्यामसुंदर उन्हें अपने अंक में भर लेते हैं। [3]
श्री गोविंदस्वामी कहते हैं कि "श्री श्यामाश्याम के कंठ अति सुघर हैं एवं दोनों मधुर राग में तान ले रहे हैं एवं राग-रंग में रंगे हैं, जिनपर मैं बलिहारी हूँ। [4]

