(कवित्त)
तुम कूं तो बानि परी पतित उधारवे की,
मो कूं यह बानि, करे पातक अति भारी है। [1]
तुम कूं यह बानि, दीन-दुखियन पै दया करन,
दीन-दुखित होऊं, जातें सोई काम धारी है॥ [2]
मैं तो नाना भाँति अपराध करत न हारयो राधे,
तू हू असंख्य निस्तारति न हारी है। [3]
तू तो पाप-पुंजन की भंजन करन हार,
करत क्यों अबेर, अब ‘विजय’ की बारी है॥ [4]
- श्री विजय सखी
हे श्री राधा, आपकी तो पतितों का उद्धार करने की प्रतिज्ञा है, लेकिन मेरी पाप करने की प्रतिज्ञा है, जिसके फलस्वरूप मैं अति भारी पातकी हो गया हूँ। [1]
दीन-दुखियों पर दया करने का आपका प्रण है, और मैं तो वही करता हूँ जिससे मैं दीन-दुःखी रहूँ। [2]
हे राधे, मैं तो अनेक प्रकार से अपराध करता आया हूँ एवं अब भी हार नहीं मानी है, लेकिन आपने भी असंख्य पतितों को तारा है एवं हार नहीं मानी। [3]
श्री विजय सखी कहते हैं कि "हे श्री राधा, आप तो पाप के पुंज का नाश करने वाली हो, अब देर क्यों कर रही हो, अब मेरी बारी है, मुझ पर भी कृपा कीजिये।" [4]

