नहिं हिंदू नहिं तुरक हम - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (5.7)

नहिं हिंदू नहिं तुरक हम - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (5.7)

(कुंडलियाँ)
नहिं हिंदू नहिं तुरक हम नहिं जैनी अँगरेज।
सुमन सम्हारत रहत नित कुंजबिहारी सेज॥ [1]
कुंजबिहारी सेज छाड़ि मग दक्षिण डेरो।
रहें बिलोकत केलि नाम भगवत अलि मेरो॥ [2]
श्रीललिता सखि पाय कृपा सेवत सुख स्याँमहिं।
नहिं काहू सों द्रोह मोह काहू सों है नहिं॥ [3]
- श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (5.7)

मैं न हिंदू हूँ, न तुर्क (मुसलमान), न जैनी और न ही अंग्रेज। मैं तो प्रेम में उन्मत्त होकर (सहचरी स्वरूप से) नित्य श्री प्रिया प्रियतम की सुमन सेज संवारता रहता हूँ। [1]

दुनिया में दक्षिण कहे जाने वाले वाम मार्ग को त्यागकर हम तो बस, प्रिया प्रियतम की रस केलियों का सतत अवलोकन किया करते हैं। इसी कारण हमारा नाम “भगवत अलि” पड गया है। [2]

ललिता सखी की कृपा से ही हमें नित्यबिहार के सुख सेवन का यह अदुभुत सौभाग्य मिला है और इसी का सेवन हम निरंतर करते रहते हैं। ऐसी स्थिति में हमारे भीतर न किसी के प्रति ईर्ष्या-द्वेष है और न किसी के प्रति मोह-ममता रह गये हैं। [3]