योऽभूद् व्रजस्योज्ज्वलकामकेल्या रासोत्सवस्ते रसरङ्गभूमौ।
नाविन्दतां तं रसमन्तरा त्वां राधामुकुन्दौ कुरुतीर्थभूमौ॥
- श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (5.33)
हे श्रीवनराज (श्री वृंदावन)! तुम्हारी रसरंगमयी भूमि में जो ब्रज की उज्जवल कामकेली का रास-रसोत्सव हुआ था, उस रस को श्री राधा और श्री कृष्ण तुम्हारे बिना (वृंदावन के अभाव में) कुरुक्षेत्र में परस्पर मिलकर भी नहीं पा सके। (अर्थात् हे वृंदावन, इस रस के तो एक मात्र तुम्हीं अधिष्ठान हो)

