देखत मुख सुख होत अधिक मन - ब्रज निधि ग्रंथावली, ब्रजनिधि पद संग्रह (72)

देखत मुख सुख होत अधिक मन - ब्रज निधि ग्रंथावली, ब्रजनिधि पद संग्रह (72)

(राग विभास)
देखत मुख सुख होत अधिक मन,
सुख की मूरति भान-दुलारी। [1]
दुख-मोचन लोचन लखि छिन छिन,
रुख लिए सेवत कुंज-बिहारी॥ [2]
परम दयाल कृपाल मृदुल मन,
सरनागत-पालक पनवारी। [3]
“ब्रजनिधि” की स्वामिनि अभिरामिनि,
श्री बनधामिनि राधा प्यारी॥ [4]
- श्री ब्रज निधि जी, ब्रज निधि ग्रंथावली, ब्रजनिधि पद संग्रह (72)

सुख की मूर्ति, वृषभानु दुलारी श्री राधा के मुख कमल को देखकर मन में अपार आनंद होता है। [1]

दुःख का हरण करने वाली श्री राधा के कमल नयनों को प्रत्येक क्षण निहारते हुए एवं उनके भौहों के इशारों को समझते हुए, कुंजबिहारी श्री कृष्ण उनकी आज्ञा मानकर सेवा करते हैं। [2]

श्री राधा परम दयालु हैं, अकारण कृपा करने वाली हैं, उनका मन अति कोमल है, वे शरणागत की रक्षा का संकल्प धारण करने वाली हैं। [3]

श्री ब्रजनिधि जी कहते हैं, "सुंदरता की खान, ब्रजधाम में रमण करने वाली श्री राधा प्यारी मेरी स्वामिनी हैं।" [4]