रसिक अनन्य उपासिका भाव भरे रस ऐंन  - श्री किशोर दास, श्री वृंदाविपुन विलास (6)

रसिक अनन्य उपासिका भाव भरे रस ऐंन - श्री किशोर दास, श्री वृंदाविपुन विलास (6)

रसिक अनन्य उपासिका, भाव भरे रस ऐंन ।
तें नित नैनन तें लखत, कहत नाँहिं कहुँ वैंन॥

- श्री किशोर दास, श्री वृंदाविपुन विलास (6)

रसिक अनन्य उपासक इस प्रकार भाव-विभोर होकर रस से भरे होते हैं कि वे नित्य अपने नैनों से प्रिया-प्रियतम की रसभरी लीलाओं का अवलोकन करते रहते हैं, परंतु अपने वचनों से कुछ भी प्रकट नहीं करते, अर्थात् इसे गोपनीय ही रखते हैं।