(राग ठुमरी)
श्री वृंदावन गह्यो आसरो, सब साधन कर हीन निहारो।
निश्चय पावत पिय प्यारी रति, ज्यों जल पावत मीन बिचारो॥ [1]
शरणागत वत्सल श्रीदंपति, सांचो करत है यह वृत धारो।
सरस माधुरी देंह दया कर, दरस परस नित करें न न्यारो॥ [2]
- श्री सरस माधुरी
जो जीव समस्त साधनों का त्याग कर श्री वृंदावन धाम का आश्रय धारण करता है और वृंदावन की ओर निहारता है, वह निश्चित ही श्री प्रिया-प्रियतम की रति उसी प्रकार प्राप्त करता है जैसे मछली की जल से रति होती है। [1]
दिव्य दंपति श्री राधा-कृष्ण सदा शरणागत वत्सल हैं और इस व्रत को कभी नहीं छोड़ते। श्री सरस माधुरी यह आश्वासन देते हैं कि श्री वृंदावन धाम के आश्रित जनों को युगल सदा अपना दर्शन एवं स्पर्श प्रदान करते हैं और उन्हें एक पल के लिए भी नहीं भुलाते। [2]
श्री वृंदावन गह्यो आसरो, सब साधन कर हीन निहारो।
निश्चय पावत पिय प्यारी रति, ज्यों जल पावत मीन बिचारो॥ [1]
शरणागत वत्सल श्रीदंपति, सांचो करत है यह वृत धारो।
सरस माधुरी देंह दया कर, दरस परस नित करें न न्यारो॥ [2]
- श्री सरस माधुरी
जो जीव समस्त साधनों का त्याग कर श्री वृंदावन धाम का आश्रय धारण करता है और वृंदावन की ओर निहारता है, वह निश्चित ही श्री प्रिया-प्रियतम की रति उसी प्रकार प्राप्त करता है जैसे मछली की जल से रति होती है। [1]
दिव्य दंपति श्री राधा-कृष्ण सदा शरणागत वत्सल हैं और इस व्रत को कभी नहीं छोड़ते। श्री सरस माधुरी यह आश्वासन देते हैं कि श्री वृंदावन धाम के आश्रित जनों को युगल सदा अपना दर्शन एवं स्पर्श प्रदान करते हैं और उन्हें एक पल के लिए भी नहीं भुलाते। [2]

