रे घनश्याम बिना रस रीते।
मन भावन आवन की यह रितु, पुनि कहा सावन बीते।
तुमसों प्रीति करि मैं पछितायी, निन्दित भई सभीते॥ [1]
घन-घन नैन रैन दिन बरसत, जरन टरत न जीते।
'ललितविहारिनि' उरलगि झूलो, पावन प्राण पिरीते॥ [2]
- श्री ललित विहारिणी जी
हे घनश्याम, तुम्हारे बिना मैं रसहीन हो गई हूँ। यह प्रिय सावन ऋतु का आगमन हुआ है, परंतु तुम्हारे बिना इसे बिताना कठिन हो रहा है। तुमसे प्रेम करके मैं बहुत पछता रही हूँ और सबके सामने निन्दित हो चुकी हूँ। [1]
घनघोर बादलों की तरह मेरे नेत्र निरंतर बरसते रहते हैं, फिर भी ह्रदय की पीड़ा शांत नहीं होती। श्री ललितविहारिनी जी कहते हैं, “हे प्राण प्रियतम, मेरे ह्रदय में आकर झूलो, तभी इस ह्रदय के ताप का शमन हो सकेगा।” [2]

