तेरौ बुरौ न कोऊ मानै - श्री सूरदास, सूर सागर

तेरौ बुरौ न कोऊ मानै - श्री सूरदास, सूर सागर

(राग धनाश्री)
तेरौ बुरौ न कोऊ मानै।
रस की बात मधुप नीरस सुनु, रसिक होत सो जानै॥ [1]
दादुर बसै निकट कमलन के, जन्म न रस पहिंचानै।
अलि अनुराग उड़न मन बाँध्यो, कहे सुनत नहिं कानै॥ [2]
सरिता चलै मिलन सागर को, कूल मूल द्रुम भानै।
कायर बकै, लोह तें भाजै, लरै जो सूर बखानै॥ [3]

- श्री सूरदास, सूर सागर

गोपियाँ कहती हैं, हे ज्ञान मार्गी उद्धव! हम तुम्हारी ब्रह्म ज्ञान की बातों का कोई बुरा नहीं मानते क्योंकि हमारी रस की बातें तो कोई रसिक ही समझ सकता है, कोई नीरस (रस विहीन) ह्रदय वाला कैसे समझेगा ? [1]

एक मेंडक सदा कमल के निकट ही बसता है फिर भी कमल के रस को नहीं समझता, परंतु उसी कमल के रस का पान करने के लिए भौंरा दूर से भी उड़कर चला आता है चाहे उसे बुलाओ या ना बुलाओ। [2]

एक नदी सागर से मिलने को चलती है तो वे किनारे, वृक्ष, मूल आदि को तोड़ते हुए आगे बढ़ती है।
कायर व्यक्ति सदा बातें बनाते हैं परंतु हथियार को देखकर भाग जाते हैं, परंतु बहादुर व्यक्ति डट कर लड़ते हैं और विजय प्राप्त करते हैं। (अर्थात् तुम्हारा निर्गुण ज्ञान इस ब्रज भूमि में बिलकुल भी चलने वाला नहीं है क्योंकि इस भूमि का कण-कण श्री कृष्ण की सगुण साकार प्रेमा-भक्ति में लीन हैं ) [3]