(सवैया)
तिरछा है किरीट कसा उर में, तिरछा बनमाल पड़ा रहता है। [1]
तिरछी कटि-काछनी है जिसमें, सुखसिन्धु सदा उमड़ा रहता है॥ [2]
तिरछे पदकञ्ज कदम्ब तरें, तिरछे दृग तान खड़ा रहता है। [3]
किस भाँति निकालें कहो दिलसे, तिरछा घनश्याम अड़ा रहता है॥ [4]
- ब्रज के सवैया
तिरछे मुकुट को धारण किए हुए, और तिरछी वनमाला से ही वे सुशोभित हैं। [1]
कमर पर तिरछी काछनी सजी हुई है, जिसमें सुख का महासागर निरंतर लहराता रहता है। [2]
उसके चरण-कमल भी तिरछे ही हैं, और वह कदंब के वृक्ष के नीचे अपनी मोहक तिरछी दृष्टि से निहारता हुआ खड़ा है। [3]
उसे हृदय से कैसे अलग किया जाए, क्योंकि वह तिरछा ललित त्रिभंगी श्यामसुंदर सदा हृदय में अटल बसा रहता है। [4]
तिरछा है किरीट कसा उर में, तिरछा बनमाल पड़ा रहता है। [1]
तिरछी कटि-काछनी है जिसमें, सुखसिन्धु सदा उमड़ा रहता है॥ [2]
तिरछे पदकञ्ज कदम्ब तरें, तिरछे दृग तान खड़ा रहता है। [3]
किस भाँति निकालें कहो दिलसे, तिरछा घनश्याम अड़ा रहता है॥ [4]
- ब्रज के सवैया
तिरछे मुकुट को धारण किए हुए, और तिरछी वनमाला से ही वे सुशोभित हैं। [1]
कमर पर तिरछी काछनी सजी हुई है, जिसमें सुख का महासागर निरंतर लहराता रहता है। [2]
उसके चरण-कमल भी तिरछे ही हैं, और वह कदंब के वृक्ष के नीचे अपनी मोहक तिरछी दृष्टि से निहारता हुआ खड़ा है। [3]
उसे हृदय से कैसे अलग किया जाए, क्योंकि वह तिरछा ललित त्रिभंगी श्यामसुंदर सदा हृदय में अटल बसा रहता है। [4]

