गर्भ-बास अति त्रास मैं जहाँ न एकौ अंग - श्री सूरदास, सूर सागर

गर्भ-बास अति त्रास मैं जहाँ न एकौ अंग - श्री सूरदास, सूर सागर

गर्भ-बास अति त्रास मैं, जहाँ न एकौ अंग।
सुनि सठ, तेरौ प्रानपति, तहँउ न छाँड़यौ संग॥

- श्री सूरदास, सूर सागर

अरे मूढ़, सुन! गर्भवास जैसी भयावह अवस्था में, जहाँ तेरा एक भी अंग पूर्ण रूप से विकसित नहीं हुआ था, वहाँ भी भगवान ने एक क्षण के लिए भी तेरा साथ नहीं छोड़ा। वही भगवान ही केवल तेरे सच्चे हितैषी और रक्षक हैं।