श्रीबिहारनिदास लडावत त्यौं त्यौं, अलकलडे लडकांहि। [1]
उमा रमा को सची सरस्वती, ब्रजजुवती ललचांहि॥ [2]
तिनको दरस देव दुर्ल्लभ जे, आराधा राधांहि। [3]
भुव बसि वृन्दावन नहिं सेवत, ते प्रानी पछितांहि॥ [4]
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जू की वाणी, रस के पद (169)
श्री बिहारिनदेव कहते हैं कि इस नित्य विहार रस में जैसे-जैसे सहचरियाँ प्रिया प्रीतम को प्रेम से लाड़ लड़ाती हैं, उनकी ललक (लालसा) और-और बढ़ती जाती है। [1]
पार्वती, लक्ष्मी, इन्द्राणी और सरस्वती जैसी देवियों की तो बात ही क्या, ब्रज की गोपियों को भी इस नित्य विहार रस में प्रवेश का अधिकार नहीं है। [2]
जो श्री राधा का अनन्य भाव से भजन करते हैं, उनके दर्शन तो देवताओं के लिए भी दुर्लभ हैं। [3]
जो प्राणी धरती पर रहते हुए वृन्दावन का वास एवं वृंदावन की सेवा नहीं करते, वे अंत में केवल पछताते हैं। [4]
उमा रमा को सची सरस्वती, ब्रजजुवती ललचांहि॥ [2]
तिनको दरस देव दुर्ल्लभ जे, आराधा राधांहि। [3]
भुव बसि वृन्दावन नहिं सेवत, ते प्रानी पछितांहि॥ [4]
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जू की वाणी, रस के पद (169)
श्री बिहारिनदेव कहते हैं कि इस नित्य विहार रस में जैसे-जैसे सहचरियाँ प्रिया प्रीतम को प्रेम से लाड़ लड़ाती हैं, उनकी ललक (लालसा) और-और बढ़ती जाती है। [1]
पार्वती, लक्ष्मी, इन्द्राणी और सरस्वती जैसी देवियों की तो बात ही क्या, ब्रज की गोपियों को भी इस नित्य विहार रस में प्रवेश का अधिकार नहीं है। [2]
जो श्री राधा का अनन्य भाव से भजन करते हैं, उनके दर्शन तो देवताओं के लिए भी दुर्लभ हैं। [3]
जो प्राणी धरती पर रहते हुए वृन्दावन का वास एवं वृंदावन की सेवा नहीं करते, वे अंत में केवल पछताते हैं। [4]

