(कवित्त)
रूप हद नेह हद मधुर अनूप हद,
सीतल सुघर हद मन के हरण हैं। [1]
विमल पराग हद अरुण अमित हद,
पानप सरस हद दुति के धरण हैं॥ [2]
नख जिमि इन्दु हद अंबुज वरण हद,
प्रेम कौ समूह हद लाल वसीकरण हैं। [3]
प्रेम सखी सुधा हद उपमा लजात हद,
सुख के कारण हद राधे के चरण हैं॥ [4]
- श्री प्रेमदास जी (लाल बलबीर जी के भ्राता), श्री प्रेम दास जी की वाणी (24)
जो सुंदरता, प्रेम, अद्वितिय मधुरता, शीतलता, सुघरता की सीमा हैं एवं मन को हरने वाले हैं! [1]
जो विमल पराग, अरुणता, कांति एवं सरसता की सीमा हैं, जो सुन्दर आभा के घर हैं! [2]
जिनके नख का प्रकाश चंद्र की सीमा हैं, जो कमल वर्ण की सीमा हैं, जो प्रेम के समूह की सीमा हैं एवं जो लाल श्री कृष्ण को सदा वश में करने वाले हैं! [3]
श्री प्रेम सखी कहते हैं कि "जो सुधा की सीमा हैं, जिनके समक्ष उपमा भी लज्जित है, जो समस्त सुखों का मूल कारण हैं, वे श्री राधा के चरण कमल हैं।" [4]

