कुंज पुलिन कौतिक घनौं, मिलि खेलत रस रासि।
श्रीबिहारीबिहारिनिदासि संग, सुख निरखि नागरीदासि॥
- श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जी की वाणी, साखी (18)
श्री धाम वृंदावन में, श्री यमुना के तट पर स्थित नवनिकुंजों में, श्री युगल (श्री राधा-कृष्ण) अगाध प्रेम से भरे नए-नए कौतुक खेल रहे हैं। हे नागरीदास! युगल (श्री बिहारी-बिहारिनी) की सहचरी भावापन्न दासियों के संग-संग, तुम भी अपना मन लगाकर इस अद्भुत सुख का सतत अवलोकन करो!

