कृपासिन्धु आनन्दकन्द दम्पति रसभीने - श्री रसिक गोविंद, श्री युगल रस माधुरी (2)

कृपासिन्धु आनन्दकन्द दम्पति रसभीने - श्री रसिक गोविंद, श्री युगल रस माधुरी (2)

कृपासिन्धु आनन्दकन्द, दम्पति रसभीने।
मोसे मूढ़ अनेक पतित, जिन पावन कीने॥

- श्री रसिक गोविंद, श्री युगल रस माधुरी (2)

हे कृपा के सागर, आनंदकंद, और सदा रस में मग्न दिव्य युगल (श्री राधा-कृष्ण)! आपकी अनंत कृपा ने मेरे जैसे असंख्य मूर्खों और पतितों का उद्धार किया है।