(राग सोरठ)
जै श्रीहरिदास रसिक वर की।
परम अनन्य सुधरम बतायौ, करमनि की छाती धरकी॥ [1]
नित्यविहार निरंतर निरखैं, जहाँ नहीं गम विधि-हरकी।
रूप-रंग रस-जस कल गावैं, तिनुका लौं माया तरकी॥ [2]
- श्री रूप सखी, श्री रूप सखी जी की वाणी, सिद्धांत के पद (36)
रसिकवर श्रीस्वामी हरिदासजी की सदा जय हो, जिन्होंने इस धराधाम पर अवतार लेकर ऐसा अनुपम अनन्य धर्म प्रकट किया, जिससे विधि-निषेधात्मक शुभ और अशुभ कर्म कांप उठे हैं। [1]
ब्रह्मा और महादेव जैसे परम वैष्णवों के लिए भी जिसकी केवल एक झलक पाना अत्यंत कठिन है, उस परम अद्भुत नित्य विहार रस को यह सतत पान करते हैं। श्रीरूपसखीजी कहती हैं कि माया के दुर्जय बंधनों को तिनके की भाँति तोड़कर ये श्यामा-कुंजविहारी के रूप-रंग, रस-यश को दिव्य माधुर्य के साथ सदा गान करते रहते हैं। [2]

