सुभग गोरी के गोरे पाँइ - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (80)

सुभग गोरी के गोरे पाँइ - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (80)

(राग षट)
सुभग गोरी के गोरे पाँइ।
स्याम कामबस जिनहिं हाथगहि, राखत कंठ लगाइ॥ [1]
कोटि चंद नखमनि पर वारौं, गति पर हंसके राइ।
नूपुरध्वनि पर मुरली वारौं, जावक पर ब्रजराइ॥ [2]
जाके परस सरस वृंदावन, वरषत सुखनि अघाइ।
ताके सरन रहत का को डरु, कहत व्यास समुझाइ॥ [3]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (80)

गौरवर्ण वाली श्री राधिका के गोरे चरणारविंद की शोभा अत्यंत सुंदर है, जिन्हें स्वयं श्यामसुंदर प्रेम-विवशता से अपने करकमलों में धारण करते हैं और अपने कंठ से लगाते हैं। [1]

श्री राधिका के चरणों की नखमणि पर कोटि-कोटि चंद्रमाओं को न्योछावर कर देना चाहिए, और उनकी गति पर हंसराज को न्योछावर कर देना चाहिए। उन श्री चरणों से उत्पन्न नूपुर की मधुर ध्वनि पर श्रीकृष्ण की मुरली को न्योछावर कर देना चाहिए, और उन चरणों में रंजित जावक पर स्वयं ब्रजराज श्रीकृष्ण को भी न्योछावर कर देना चाहिए। [2]

यह श्री चरणों के स्पर्श का ही प्रताप है कि सम्पूर्ण वृंदावन की भूमि सदा अति सरस रस बरसाती रहती है और कभी अघाती नहीं। श्री हरिराम व्यास डंके की चोट पर कहते हैं कि श्री राधा के गोरे चरणों की शरण लेने वाला हर जीव अभय (निर्भय) पद को प्राप्त कर लेता है। [3]