श्री राधिका-पद-कमल माधुरी परम रस, बिना हरिवंश हित को बखानै।
निगम आगम अगम अगोचर सु शुक शिव विधिन, रमापति आदि नहीं लगत ध्यानै॥ [1]
रसिक सिरमौर जग विमुख लखि ललित बपु, कियौ रस प्रगट कछु रही न छानै।
जासु मुख कमल बानी सु मकरंद रस, श्रवन सुनि लाड़िली अति प्रमानै॥ [2]
नित्य नव कुंज रस पुंज गुंजत भँवर, तहाँ जुग लाड़ लाड़त सहानै।
धन्य बड़भाग गावत जु जै नाम गुन, वंशी अलि सुखित सुनि श्रवन माने॥ [3]
- श्री वंशी अलि
श्री राधारानी के चरण कमलों की अपार रस-माधुरी का गान, श्री हित हरिवंश के अतिरिक्त और कौन कर सकता है? ये दिव्य चरण कमल वेदों और पुराणों के लिए भी अगम्य और अगोचर हैं और श्री शुकदेव मुनि, शिव, ब्रह्मा और भगवान नारायण आदि के भी ध्यान में नहीं आते । [1]
जगत को विशुद्ध भक्ति से विमुख देखकर, रसिक शिरोमणि श्री हित हरिवंश ने श्री राधा जू के इस अति गोपनीय प्रेम-रस को पूर्णतः उजागर कर दिया और कुछ भी छुपा कर नहीं रखा। श्री हित हरिवंश के मुख कमल से झरने वाली वाणी के मकरंद रस को सुनकर, स्वयं श्री राधा भी उसको अत्यंत प्रमाणित करती हैं । [2]
जो रस की अनंत खान है और जहाँ भँवरे आनंद में डूबे हुए मस्ती से मंडराते रहते हैं, ऐसे नित्य नवीन कुंजों में श्री हित हरिवंश जी श्री श्यामा-श्याम को प्रेमपूर्वक लाड़ लड़ाते रहते हैं। श्री वंशी अलि जी कहते हैं, "वे धन्य हैं जो श्री हित हरिवंश जी के नाम और गुणों का गान करते हैं; जिनके गायन को सुनकर मैं अपार सुख अनुभव करता हूँ।" [3]

