तनमन हमारो सो तो सबही लडैतीजू को - ललित किशोरी जी, अभिलाष माधुरी, विनय (123)

तनमन हमारो सो तो सबही लडैतीजू को - ललित किशोरी जी, अभिलाष माधुरी, विनय (123)

(राग जैजैवंती)
तनमन हमारो सो तो सबही लडैतीजू को,
जीवन हमारो वृषभानुजा दुलारी हैं। [1]
अधर अमृत पान रसना ललचाई,
हाथ हू हमारे पद सेवा अधिकारी हैं॥ [2]
कोऊ पर ब्रह्म जगव्यापि निराकार कहो,
ललित किशोरी वन कुंजन विहारी हैं। [3]
नैना हूँ हमारे मृगछौना हैं खिलौना वीर,
पलकैं हमारी मग प्यारी की बुहारी हैं॥ [4]
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (123)

हमारा तन, मन और सर्वस्व तो लड़ैती जू (श्री राधा) का ही है, और हमारा जीवन भी वृषभानु नंदिनी श्री राधा ही हैं। [1]

उनके अधरामृत के प्रसाद को पान करने के लिए मेरी जिह्वा व्याकुल हो उठती है, और मेरे हाथ उनके चरण कमलों की सेवा में समर्पित होने को आतुर रहते हैं। [2]

चाहे कोई उन्हें परम ब्रह्म, सर्वव्यापी और निराकार माने, लेकिन हमारे लिए तो वे वृन्दावन के कुंजों में विहार करने वाली हैं। [3]

हमारी आँखें तो मृगछौना के समान सदा ही श्री राधा प्यारी के दर्शनों में मग्न रहती हैं, और हमारी पलकें हर समय उनके मार्ग को बुहारने को तत्पर रहती हैं। [4]