प्राण पालित पाइनि परें, परसें होत निहाल ।
यहै दसा सेवत सखी, दूलह दूलहनि लाल ॥
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (142)
श्रीलालजी (श्रीकृष्ण) की अद्भुत प्रेमासक्ति का वर्णन कैसे किया जाए? जिनके प्राणों का पालन एकमात्र श्री प्यारीजू (श्रीराधा) के चरणकमलों में सदा पड़े रहने से ही होता है । उन्हीं चरणों के सदा सपरस मिलने से वे सदा निहाल रहते हैं। नित्य विहार रस में सखियाँ इस प्रकार की विचित्र प्रेम-लीलायों से भरे हुए इन नव दूल्हा-दुल्हन को निरंतर लाड़ लड़ाती रहती हैं।
यहै दसा सेवत सखी, दूलह दूलहनि लाल ॥
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (142)
श्रीलालजी (श्रीकृष्ण) की अद्भुत प्रेमासक्ति का वर्णन कैसे किया जाए? जिनके प्राणों का पालन एकमात्र श्री प्यारीजू (श्रीराधा) के चरणकमलों में सदा पड़े रहने से ही होता है । उन्हीं चरणों के सदा सपरस मिलने से वे सदा निहाल रहते हैं। नित्य विहार रस में सखियाँ इस प्रकार की विचित्र प्रेम-लीलायों से भरे हुए इन नव दूल्हा-दुल्हन को निरंतर लाड़ लड़ाती रहती हैं।

