श्री राधे जू निरुपम रूप तिहारो।
अद्भुत रास रसिक मन मोहत, निरखत होत सुखारो। [1]
ब्रज वृन्दावन सहज माधुरी, लीला मधुर निहारो।
मो मन फली रूप की वेली, ‘नवल’ श्याम उजियारो॥ [2]
- श्री नवल लाल गोस्वामी
श्री राधे जू! आपका सौंदर्य अतुलनीय और वर्णन से परे है। आपकी अद्भुत रास लीलाएँ रसिकों के हृदय को मोहित कर, उन्हें अपार आनंद से भर देती हैं। [1]
ब्रज और वृंदावन में आपकी दिव्य लीलाओं की स्वाभाविक मधुरता हृदय को मोहित कर लेती है। मेरे मन में आपके रूप-सौंदर्य की लता खिल उठी है, जिसे नवल श्यामसुंदर अपनी दिव्य मोहकता से प्रकाशित कर रहे हैं। [2]
अद्भुत रास रसिक मन मोहत, निरखत होत सुखारो। [1]
ब्रज वृन्दावन सहज माधुरी, लीला मधुर निहारो।
मो मन फली रूप की वेली, ‘नवल’ श्याम उजियारो॥ [2]
- श्री नवल लाल गोस्वामी
श्री राधे जू! आपका सौंदर्य अतुलनीय और वर्णन से परे है। आपकी अद्भुत रास लीलाएँ रसिकों के हृदय को मोहित कर, उन्हें अपार आनंद से भर देती हैं। [1]
ब्रज और वृंदावन में आपकी दिव्य लीलाओं की स्वाभाविक मधुरता हृदय को मोहित कर लेती है। मेरे मन में आपके रूप-सौंदर्य की लता खिल उठी है, जिसे नवल श्यामसुंदर अपनी दिव्य मोहकता से प्रकाशित कर रहे हैं। [2]

