छुवत राधिका-अंग कौ, कंप-स्वेद ह्वै जाय ।
होत न नैंक सिंगार हू, कैसे ब्रजनिधि राय॥
- श्री ब्रज निधि जी, ब्रज निधि ग्रंथावली, ब्रज शृंगार (28)
श्रीकृष्ण जैसे ही श्रीराधिका का श्रृंगार करने के लिए अपने करकमलों से उनके अंग को स्पर्श करते हैं, उनका शरीर कंप, स्वेद आदि सात्विक भावों से रोमांचित हो उठता है। ऐसी दिव्य प्रेममयी अवस्था में ब्रजराज श्रीकृष्ण श्री राधा का थोड़ा सा श्रृंगार करने में भी असमर्थ हो जाते हैं।
होत न नैंक सिंगार हू, कैसे ब्रजनिधि राय॥
- श्री ब्रज निधि जी, ब्रज निधि ग्रंथावली, ब्रज शृंगार (28)
श्रीकृष्ण जैसे ही श्रीराधिका का श्रृंगार करने के लिए अपने करकमलों से उनके अंग को स्पर्श करते हैं, उनका शरीर कंप, स्वेद आदि सात्विक भावों से रोमांचित हो उठता है। ऐसी दिव्य प्रेममयी अवस्था में ब्रजराज श्रीकृष्ण श्री राधा का थोड़ा सा श्रृंगार करने में भी असमर्थ हो जाते हैं।

