रसिक संग बिनु प्रेम न होई़ - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (162)

रसिक संग बिनु प्रेम न होई़ - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (162)

रसिक संग बिनु प्रेम न होई।
बिनु पद प्रेम भये अलबेली, भव सौं छुटत न कोई॥ [1]
कीजै कृपा कृपालु किशोरी, रसिक संग जो पावौं।
जासौं उपजै भाव हिये में, चरण कमल चित लावौं॥ [2]
निशि-वासर करि तिनकी सेवा, तन की तपन मिटैये।
तन मन जीवन वारिय ‘भोरी’, आँखिन माँहि बसैये॥ [3]
- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (162)

प्रेम-रस के अनन्य उपासक अर्थात् रसिक संतों के संग के बिना हृदय में अति दुर्लभ प्रेम की उत्पत्ति नहीं हो सकती और जब तक अलबेली स्वामिनी श्रीराधा के चरण-कमलों में सहज प्रीति नहीं होगी, तब तक सांसारिक बन्धनों से छुटकारा मिलना असम्भव ही है। [1]

इसलिए हे नित्य नव किशोरी श्रीराधे ! आप तो परम कृपालु हैं। अतः आप ही मुझे वृन्दावन-रस-रसिकों का संग-लाभ प्राप्त कराने की कृपा करें, जिसके फल स्वरूप मेरे हृदय में आपके चरण-कमलों के प्रति अटूट अनुराग उत्पन्न हो जाय। [2]

श्रीहित भोरीसखी जी कहती हैं कि रसिकजनों की दिन-रात सेवा करने, उन्हें अपने तन-मन-प्राण समर्पण करने एवं उन्हें अपनी आँखों में बसा लेने से दैहिक, दैविक एवं भौतिक स्वरूपी त्रिविध तापों से स्वतः ही मुक्ति मिल जाति है। [3]