हौं कहि हों नाहिंन कछू पोढ़ी कुंवर सुखरास - श्री वंशी अलि, हृदय सर्वस्व (43)

हौं कहि हों नाहिंन कछू पोढ़ी कुंवर सुखरास - श्री वंशी अलि, हृदय सर्वस्व (43)

हौं कहि हों नाहिंन कछू, पोढ़ी कुंवर सुखरास।
निरखि निरखि मोकों बढ़ै, श्री राधा मुख की प्यास॥

- श्री वंशी अलि, हृदय सर्वस्व (43)

सुख की राशि किशोरी जब पौढ़ी होंगी, मैं कुछ भी नहीं बोलूँगा, उनको निहार-निहार कर मेरे ह्रदय में उनके मुख दर्शन की प्यास और-और बढ़ेगी।