(राग विहाग)
मेरो मन श्यामा-श्याम हर्यो री।
मृदु मुसकाय गाय मुरली मैं, चेटक चतुर कर्यो री॥ [1]
वा छवि तैं मन नेक न निकसत, निस-दिन रहत अर्यो री।
अली किशोरी रूप निहारत, परबस प्रान पर्यो री॥ [2]
- श्री किशोरी अलि
मेरा मन युगल किशोर, श्री श्यामा-श्याम ने पूरी तरह मोह लिया है! उनकी कोमल मुस्कान और बांसुरी की मनमोहक ध्वनि ने मानो मेरे ऊपर जादू कर दिया है। [1]
उनकी अनुपम छवि से मेरा मन ज़रा भी विचलित नहीं होता, दिन-रात उसी रूप-माधुरी में डूबा रहता है। श्री किशोरी अली कहते हैं, "नित्य किशोर-किशोरी के अद्वितीय रूप को निहारते हुए मेरे प्राण भी मेरे नियंत्रण में नहीं रहे; वे पूरी तरह उन्हीं के हो गए हैं।" [2]

