श्रीस्वामी हरिदास को अद्भुत नित्यविहार - श्री रसिक अली

श्रीस्वामी हरिदास को अद्भुत नित्यविहार - श्री रसिक अली

(कुण्डलियाँ)
श्रीस्वामी हरिदास को, अद्भुत नित्यविहार।
बिलसै निधुवन कुंज में, रसिकन जीवन-सार॥ [1]
रसिकन जीवन-सार, श्याम-श्यामा की लीला।
अनुपम पावन नित्य केलि, सखि निरखें क्रीला॥ [2]
निरखें नैना सुख बहे, निरखें सुख अंग-अंग।
‘रसिकअली’ को सुख यही, याहि को नित संग॥ [3]

- श्री रसिक अली

अनन्य रसिक नृपति श्री स्वामी हरिदास जी की उपासना पद्धति, “नित्य विहार” रस, अति अद्भुत है। यह परम दिव्य रस निधिवन में नित्य बरसता रहता है, जो अनन्य रसिकों के जीवन का आधार है। [1]

श्री श्यामा-श्याम की प्रेममयी लीलाएँ ही रसिकों के जीवन का सार हैं। यह अनुपम, परम पावन एवं नित्य केली की क्रीड़ायों को सखियाँ प्रेम में मगन होकर निरखती रहती हैं  । [2]

इन केली लीलाओं को निहार कर नेत्रों से सुखधारा प्रवाहित होती है, और प्रत्येक अंग रस में भीग जाता है। श्री रसिक अली जी के प्राणों का आधार भी यही “नित्य विहार” रस है। [3]