(राग कानरा)
प्यारी तेरो मानु मनावन आँई।
रसिक लाल भेजी करुणा करि, बार बार पर्यो पाँई॥ [1]
एतो हठु तुम कीओ उन सों, ऐसे बनत है नाँही॥
केवल पलक ओट तुमही बिनु, पीय व्याकुल मन माँही॥ [2]
- श्री केवल राम जी, रास मान के पद (25)
हे प्यारी जू, आपके मान को दूर कर मैं आपको मनाने आयी हूँ। रसिकराज श्रीकृष्ण बार-बार मेरे चरणों में गिर रहे हैं। उन्होंने प्रेम और करुणा से प्रेरित होकर मुझे आपके पास भेजा है। [1]
आपने प्रियतम से जो इतना हठ किया है, यह आपके करुणामयी स्वभाव के अनुकूल नहीं है। श्री केवलराम जी कहते हैं, “हे प्यारी श्री राधा, आपके वियोग में प्रियतम श्रीकृष्ण का हृदय हर क्षण व्याकुल और अशांत रहता है।” [2]
प्यारी तेरो मानु मनावन आँई।
रसिक लाल भेजी करुणा करि, बार बार पर्यो पाँई॥ [1]
एतो हठु तुम कीओ उन सों, ऐसे बनत है नाँही॥
केवल पलक ओट तुमही बिनु, पीय व्याकुल मन माँही॥ [2]
- श्री केवल राम जी, रास मान के पद (25)
हे प्यारी जू, आपके मान को दूर कर मैं आपको मनाने आयी हूँ। रसिकराज श्रीकृष्ण बार-बार मेरे चरणों में गिर रहे हैं। उन्होंने प्रेम और करुणा से प्रेरित होकर मुझे आपके पास भेजा है। [1]
आपने प्रियतम से जो इतना हठ किया है, यह आपके करुणामयी स्वभाव के अनुकूल नहीं है। श्री केवलराम जी कहते हैं, “हे प्यारी श्री राधा, आपके वियोग में प्रियतम श्रीकृष्ण का हृदय हर क्षण व्याकुल और अशांत रहता है।” [2]

