(राग केदारौ)
बनी री तेरे चारि चारि चूरी करनि।
कंठसिरी दुलरी हीरनि की नासा मुकता ढरनि॥ [1]
तैसोई नैननि कजरा फबि रह्यौ निरिख काम डरनि।
श्रीहरिदास के स्वामी श्यामा कुंजबिहारी
रीझि रीझि पग परनि॥ [2]
- श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (50)
हे प्यारीजू (श्री राधा), आपके प्रत्येक हाथ में चार चूड़ियाँ सुशोभित हैं। एक बहुमूल्य हीरे का हार आपके गले की शोभा बढ़ा रहा है, और आपकी नथ से मोती झूल रहे हैं। [1]
आपकी काजल से सजी आँखें इतनी सम्मोहक हैं कि स्वयं कामदेव भी उन्हें देखकर डर से कांप उठा है। श्री हरिदास के स्वामी, कुंजबिहारी, आपके अनुपम सौंदर्य से इतने मोहित हैं कि वे आपके चरण कमलों में पड़े हुए हैं । [2]
बनी री तेरे चारि चारि चूरी करनि।
कंठसिरी दुलरी हीरनि की नासा मुकता ढरनि॥ [1]
तैसोई नैननि कजरा फबि रह्यौ निरिख काम डरनि।
श्रीहरिदास के स्वामी श्यामा कुंजबिहारी
रीझि रीझि पग परनि॥ [2]
- श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (50)
हे प्यारीजू (श्री राधा), आपके प्रत्येक हाथ में चार चूड़ियाँ सुशोभित हैं। एक बहुमूल्य हीरे का हार आपके गले की शोभा बढ़ा रहा है, और आपकी नथ से मोती झूल रहे हैं। [1]
आपकी काजल से सजी आँखें इतनी सम्मोहक हैं कि स्वयं कामदेव भी उन्हें देखकर डर से कांप उठा है। श्री हरिदास के स्वामी, कुंजबिहारी, आपके अनुपम सौंदर्य से इतने मोहित हैं कि वे आपके चरण कमलों में पड़े हुए हैं । [2]

