महाछवि राजें कोटि भानु लिखि लाजैं रूप - श्री चंद्र लाल गोस्वामी जी, वृंदावन प्रकाश माला

महाछवि राजें कोटि भानु लिखि लाजैं रूप - श्री चंद्र लाल गोस्वामी जी, वृंदावन प्रकाश माला

(कवित्त)
महाछवि राजें कोटि भानु लिखि लाजैं रूप,
अंकहि विराजैं प्यारी प्रिय निज वृन्दावन।[1]
मनिमय भूमि जाकी उपमा कौं नहीं ताकी,
याकी बात बाँकी जहँ बिहरत दोऊ जन॥ [2]
सेवाकुंज-मण्डल पुलिन वंशीवट तट,
जमुना निकट सोहैं प्रेम बनितान गण। [3]
दीये गलबाँही सखीमण्डल के माँहि ‘चन्द्र-
हित’ बलि जाँहीं वारे प्रान-तन-मन-धन॥ [4]

- श्री चंद्र लाल गोस्वामी जी, वृंदावन प्रकाश माला

निज धाम श्री वृंदावन में दिव्य युगल श्री राधा-कृष्ण एक दूसरे के अंक में विराज रहे हैं, जिनकी महाछवि की कांति कोटि-कोटि सूर्यों की आभा को भी तुच्छ कर रही है। [1]

रत्नों से विभूषित श्री वृंदावन की भूमि अनुपम है, जिसकी अद्वितीय महिमा की कोई उपमा नहीं दी जा सकती। यह वही भूमि है जहाँ प्रिया-प्रियतम नित्य विहार में आनंद मग्न हैं। [2]

सेवाकुंज, वंशीवट, और यमुना तट जैसे पवित्र स्थल अद्भुत शोभा से विभूषित हैं, जहाँ दिव्य युगल के संग उनकी प्रिय सहचरियाँ भी आनंदमग्न होकर विराजमान हैं। [3]

सखियों को अपार आनंद देने के लिए श्री राधा-कृष्ण आलिंगनबद्ध होकर खड़े हैं। उनके इस अलौकिक स्वरूप का दर्शन कर श्री हित चंद्र लाल जी अपने प्राण, तन, मन और धन सब कुछ न्योछावर कर रहे हैं। [4]