झूठ झूठ में रची रहै, साँचे जानत नाहिं।
कुँजबिहारिनि लाड़िली, कैसें पकरै बाहिं॥
- श्री ललितकिशोरी देव, श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (211)
जो लोग झूठ, मायिक-प्रपंच में फँसे रहते हैं, वे परम सत्य को कभी नहीं पहचान पाते। ऐसे में, श्री कुंजबिहारिनि लाड़िली (श्री राधा) कैसे उनकी बाँह पकड़कर उनके योगक्षेम का वहन करेंगी?
कुँजबिहारिनि लाड़िली, कैसें पकरै बाहिं॥
- श्री ललितकिशोरी देव, श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (211)
जो लोग झूठ, मायिक-प्रपंच में फँसे रहते हैं, वे परम सत्य को कभी नहीं पहचान पाते। ऐसे में, श्री कुंजबिहारिनि लाड़िली (श्री राधा) कैसे उनकी बाँह पकड़कर उनके योगक्षेम का वहन करेंगी?

