साँवरे क्यों मोसों रिस मानी - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, युगल छदम लीला (8)

साँवरे क्यों मोसों रिस मानी - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, युगल छदम लीला (8)

(राग झंझोटी)
साँवरे क्यों मोसों रिस मानी।
तेरे काज घरबार त्यागि के, गलियन फिरत दिवानी। [1]
लोकलाज कुलरीति प्रीति जग, इन्हूँ को दियो पानी।
नारायण अब तौ हँसि चितवौ, एरे रूप गुमानी॥ [2]

- श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, युगल छदम लीला (08)

हे श्यामसुन्दर! क्यों मुझसे नाराज़ हो? मैंने तो तुम्हारे कारण अपना घर-बार छोड़ दिया है और गलियों में दीवानी सी बनकर डोल रही हूँ। [1]

लोकलाज, कुलरीति, एवं जगत की प्रीति आदि को त्याग दिया है । नारायण स्वामी कहते हैं कि हे रूप के गुमानी! अब तो मुस्कुराकर मेरी ओर निहार लो! [2]