सारंग नैनी सारंग गावे -  श्री चतुर्भुजदास जी

सारंग नैनी सारंग गावे - श्री चतुर्भुजदास जी

(राग सारंग)
सारंग नैनी सारंग गावै ।
तनसुख सारी पहरि झीनी अति, मधुर मधुर सुर बीन बजावे॥ [1]
अंजन नैन आँजि बिंदुली दै, सैन बैन दृढ़ बान चलावे।
‘चतुर्भुज’ प्रभु गिरिधरन लाल कें, चित अति रति अंतर उपजावे॥ [2]

- श्री चतुर्भुज दास

सारंग जैसे नेत्रों वाली मृगनयनी श्री राधा, मधुर राग सारंग गा रही हैं। अत्यंत मनमोहक साड़ी धारण कर, वे मधुर-मधुर सुर से वीणा वादन कर रही हैं । [1]

उनके नेत्र काजल से सुसज्जित हैं, माथे पर शोभायमान बिंदी उनकी आभा को बढ़ा रही है। वे प्रेममयी चितवन और मोहक सैन-बैन से तीखे बाण चला रही हैं। श्री चतुर्भुज दास कहते हैं, “उनकी इस अनुपम छवि को देखकर प्रभु गिरिधर लाल श्रीकृष्ण के हृदय में प्रेम का तूफान उमड़ पड़ता है।”