नंदनंदन मन हरन लाड़िले, मेरी ओर निहारो।
माखन हू तें मृदुल कमल तें, कोमल अंग तिहारो॥ [1]
एक बात यह मोंहि बतावो, कैसे गिरिवर धारो।
निरखत हौं जब चलत महीपै, सकुचत हियौ हमारो॥ [2]
- रासलीला का पद
मेरे हृदय को चुराने वाले हे प्रिय नंदनंदन (श्रीकृष्ण), कृपया अपनी कृपामयी दृष्टि से मेरी ओर निहारिये । आप मक्खन से भी अधिक मृदुल एवं आपके अंग कमल से भी अधिक कोमल हैं। [1]
कृपया मुझे एक बात बताइए—आपने विशाल गोवर्धन पर्वत को कैसे उठाया? जब मैं आपको पृथ्वी पर चलते हुए देखता हूँ, तो मेरा हृदय सकुचा उठता है। [2]
माखन हू तें मृदुल कमल तें, कोमल अंग तिहारो॥ [1]
एक बात यह मोंहि बतावो, कैसे गिरिवर धारो।
निरखत हौं जब चलत महीपै, सकुचत हियौ हमारो॥ [2]
- रासलीला का पद
मेरे हृदय को चुराने वाले हे प्रिय नंदनंदन (श्रीकृष्ण), कृपया अपनी कृपामयी दृष्टि से मेरी ओर निहारिये । आप मक्खन से भी अधिक मृदुल एवं आपके अंग कमल से भी अधिक कोमल हैं। [1]
कृपया मुझे एक बात बताइए—आपने विशाल गोवर्धन पर्वत को कैसे उठाया? जब मैं आपको पृथ्वी पर चलते हुए देखता हूँ, तो मेरा हृदय सकुचा उठता है। [2]

