श्रीवृन्दावनवत्तिरनि यत्र - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (10.12)

श्रीवृन्दावनवत्तिरनि यत्र - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (10.12)

श्रीवृन्दावनवत्तिरनि यत्र क्वचनापि सापराधस्य।
राधाकृष्णद्रोहिण उरुतरनरकात कदापि नोद्धार:॥

- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (10.12)

श्रीवृन्दावन का जहां भी कोई अपराध करता है, वह साक्षात श्रीराधाकृष्ण का ही द्रोही है। उसका बहुत काल तक पीछे भी नरक से उद्धार नही होता।