आवनौ जावनौ कहूं नाहीं -  श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (64)

आवनौ जावनौ कहूं नाहीं - श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (64)

आवनौ जावनौ कहूं नाहीं, हरि पोषत मन के भाई।
रंग-महल में श्रीहरिदासी, कीनी परम बधाई॥
सदा केलि कल करत एक रस, सखियन मिलि गुन गाई।
श्रीललितमोहिनी यह सुख विलसत, छिन-छिन पर बलि जाई॥

- श्री ललितमोहिनी देव, श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (64)

हम श्रीवृन्दावन को त्यागकर अन्यत्र कहीं जाते-आते नहीं क्योंकि यहीं श्रीहरि हमारे मन के समस्त भावों का पोषण करते रहते हैं और हम श्रीहरि के भावों का (पोषण करते रहते हैं)। कुञ्ज-भवन के रंगमहल में श्रीहरिदासीजो ने ऐसा अनुपम मंगलाचरण किया है कि श्रीयुगल यहाँ सदा नित्यविहार की रस-केलि में मग्न रहते हैं।
सखियाँ मिलकर उन्हीं लीलाओं का मधुर गुणगान करती रहती हैं। मैं, ललितमोहिनी, भी इसी केलि-सुख में लीन होकर प्रतिक्षण इस पर बलिहारी जाती रहती हूँ।