धरु उन स्वामिनी को ध्यान रे - श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्री राधा माधुरी (19)

धरु उन स्वामिनी को ध्यान रे - श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्री राधा माधुरी (19)

धरु उन स्वामिनी को ध्यान रे ।
जाकि नख-मणि-चंद्र-चन्द्रिकहिं, ध्यावत श्याम सुजान रे ॥ [1]
जाकी नाम रूप गुण लीला, रसिकन जीवन प्राण रे ।
जाकी झाँकी हित सनकादिक, धर तनु तरुन लतान रे ॥ [2]
जाकि भृकुटि-विलास विलोकत, परम पुरुष भगवान् रे ।
जाकी सुनी 'कृपालु' अस महिमा, हमरहुँ मन ललचान रे ॥ [3]

- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्रीराधा–माधुरी (19)

अरे मन! तू उन वृषभानुनंदिनी स्वामिनी का ध्यान कर, जिनकी नखमणि चन्द्रिका का ध्यान स्वयं श्यामसुन्दर करते हैं । [1]

जिनके नाम, रूप, गुण, लीलादिक रसिकों का सर्वस्व है । जिनकी बाँकी झांकि को देखने के लिये सनकादिक परमहंस लता वृक्ष बनकर खड़े रहते हैं । [2]

जिनकी भौहों को पुरषोत्तम भगवान् भी डर के मारे देखते रहते हैं । जगद्गुरु श्री कृपालु जी कहते हैं उनकी ऐसी महिमा सुनकर हमारे मन में भी उनके दर्शन की लालसा उत्पन्न हो गयी है । [3]