मोहनी मूर्ति श्याम की, मो मन रही समाय ।
ज्यों मेहँदी के पात पै, लाली लखी न जाय ॥
- ब्रज के दोहे
मेरे मनरूपी मंदिर में श्यामसुंदर की मोहिनी मूर्ति इस प्रकार समाई हुई है, जैसे मेहंदी के पत्ते में उसकी लालिमा छिपी होती है। वह लालिमा बाहर से दिखाई नहीं देती, लेकिन भीतर गहराई में विद्यमान रहती है।
ज्यों मेहँदी के पात पै, लाली लखी न जाय ॥
- ब्रज के दोहे
मेरे मनरूपी मंदिर में श्यामसुंदर की मोहिनी मूर्ति इस प्रकार समाई हुई है, जैसे मेहंदी के पत्ते में उसकी लालिमा छिपी होती है। वह लालिमा बाहर से दिखाई नहीं देती, लेकिन भीतर गहराई में विद्यमान रहती है।

