(दोहा)
यही चाह चित मो चहौ, सुनौ सुघर बर बैंन ।
मधुकर ह्वै पदकंज कौ, रहौं सदा दिन रैंन ॥
(पद)
यही चाह चाहौ चित मेरौ, और चाह तन तनक न हेरौ।
मधुकर ह्वै पदपंकज केरौ, रैंन दिना करि रहौं बसेरौ॥
श्रीहरिप्रिया प्रेम उरझरौ, उरझयौ रहु न होहु सुरझेरौ ॥
- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सहज सुख (26)
श्री कृष्ण कहते हैं -
(दोहा)
हे सुघर शिरोमणि प्रियाजू (श्री राधा)! मेरे हृदय में बस यही चाह है कि अहर्निश मैं आपके चरणारविन्दों का सदा मधुकर होकर रहूँ।
(पद)
मेरे चित्त में एक मात्र यही चाह है, इस के अतिरिक्त मेरे मन में और कोई कामना हो तो आप उसकी ओर दृष्टि भी न डालें । मैं आपके चरण-कमलों का मधुकर होकर रात-दिन इन्ही में बसेरा करना चाहता हूँ।
हे श्रीहरि की प्रिया स्वामिनी जू! मेरा प्रेम एक-मात्र इन चरणारविन्दों से ही उलझा रहे, इस प्रकार के प्रेम से मैं कभी भी सुलझने न पाऊँ, यही मेरी प्रार्थना है।
यही चाह चित मो चहौ, सुनौ सुघर बर बैंन ।
मधुकर ह्वै पदकंज कौ, रहौं सदा दिन रैंन ॥
(पद)
यही चाह चाहौ चित मेरौ, और चाह तन तनक न हेरौ।
मधुकर ह्वै पदपंकज केरौ, रैंन दिना करि रहौं बसेरौ॥
श्रीहरिप्रिया प्रेम उरझरौ, उरझयौ रहु न होहु सुरझेरौ ॥
- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सहज सुख (26)
श्री कृष्ण कहते हैं -
(दोहा)
हे सुघर शिरोमणि प्रियाजू (श्री राधा)! मेरे हृदय में बस यही चाह है कि अहर्निश मैं आपके चरणारविन्दों का सदा मधुकर होकर रहूँ।
(पद)
मेरे चित्त में एक मात्र यही चाह है, इस के अतिरिक्त मेरे मन में और कोई कामना हो तो आप उसकी ओर दृष्टि भी न डालें । मैं आपके चरण-कमलों का मधुकर होकर रात-दिन इन्ही में बसेरा करना चाहता हूँ।
हे श्रीहरि की प्रिया स्वामिनी जू! मेरा प्रेम एक-मात्र इन चरणारविन्दों से ही उलझा रहे, इस प्रकार के प्रेम से मैं कभी भी सुलझने न पाऊँ, यही मेरी प्रार्थना है।

