(राग पटदीप व सारंग)
किशोरी श्यामा! तुम हो परम उदार।
जो कोउ गावत नाम तुम्हारो, ताके सु:खजु अपार॥ [1]
जन के अवगुण देखत नाहीं, तनकु न करो विचार।
शरण पड़े जो साँचे मन से, तजो न ताकी लार॥ [2]
पल पल सहाय करो तुम प्यारी, देवत नाहिं विसार।
“रूप माधुरी” आप भरोसे, सोवत पाँव पसार॥ [3]
- श्री रूपमाधुरी जी, श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (108)
हे किशोरी श्री राधा! आप तो परम उदार हैं। जो भी आपके नाम का गान करता है, वह असीम आनंद को प्राप्त करता है। [1]
आप अपने भक्तों के अवगुणों पर न दृष्टि डालती हैं, न ही उन पर एक क्षण विचार करती हैं। जो व्यक्ति सच्चे हृदय से आपकी शरण में आ जाता है, उनका संग आप कभी नहीं छोड़ती। [2]
हे प्यारीजू! आप हर क्षण उनकी सहायता करती हैं एवं उन्हें कदापि भुलाती नहीं ।
श्री रूप माधुरी जी कहते हैं कि “आपके भरोसे होकर, मैं भी परम निर्भयता को प्राप्त होकर, दोनों पाँव पसार कर सोता हूँ अर्थात् निश्चिंत हो गया हूँ" । [3]
किशोरी श्यामा! तुम हो परम उदार।
जो कोउ गावत नाम तुम्हारो, ताके सु:खजु अपार॥ [1]
जन के अवगुण देखत नाहीं, तनकु न करो विचार।
शरण पड़े जो साँचे मन से, तजो न ताकी लार॥ [2]
पल पल सहाय करो तुम प्यारी, देवत नाहिं विसार।
“रूप माधुरी” आप भरोसे, सोवत पाँव पसार॥ [3]
- श्री रूपमाधुरी जी, श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (108)
हे किशोरी श्री राधा! आप तो परम उदार हैं। जो भी आपके नाम का गान करता है, वह असीम आनंद को प्राप्त करता है। [1]
आप अपने भक्तों के अवगुणों पर न दृष्टि डालती हैं, न ही उन पर एक क्षण विचार करती हैं। जो व्यक्ति सच्चे हृदय से आपकी शरण में आ जाता है, उनका संग आप कभी नहीं छोड़ती। [2]
हे प्यारीजू! आप हर क्षण उनकी सहायता करती हैं एवं उन्हें कदापि भुलाती नहीं ।
श्री रूप माधुरी जी कहते हैं कि “आपके भरोसे होकर, मैं भी परम निर्भयता को प्राप्त होकर, दोनों पाँव पसार कर सोता हूँ अर्थात् निश्चिंत हो गया हूँ" । [3]

