(राग धनाश्री)
प्यारी तोहि वुरी वान जह मान की ॥ [1]
नैंक वंक भृकुटि देखत मोहि सुधि न रहत निजु प्राण की ।
तन मन वारि विहारिनि सांची आस एक मुसिक्यान की ॥ [2]
मुख रूख्यौ घूंटन चाहन वस अधर सुधा के पान की ।
श्री रामराय स्वामिनी हृदय में अति उदार कुल कान की ॥ [3]
- श्री रामराय जी, आदिवाणी (36)
श्रीकृष्ण श्रीराधा से कहते हैं, “हे प्यारी जू! आपकी यह मान करने की आदत मेरे लिए अत्यंत कष्टदायक है”। [1]
यदि आपकी थोड़ी सी भी टेढ़ी भौंहें देख लेता हूँ, तो मेरे प्राण अति व्याकुल हो उठते हैं, अपनी सुधि-बुधि खो बैठता हूँ । मैं सत्य कहता हूँ, आपकी एक मुस्कान की आशा पर मैं अपने तन और मन को पूर्णतः न्योछावर कर सकता हूँ। [2]
परंतु आपका मुख अब भी रूठा हुआ है, और उस पर आपने घूँघट डाल रखा है। मुझे आपके अधर सुधा रूपी प्रसाद का पान करने की प्रबल इच्छा है। हे रामरायजी की स्वामिनी! आप तो हृदय से अति उदार हैं और अपने कुल की शिरोमणि हैं। कृपा करके अपने मान को त्याग दें। [3]
प्यारी तोहि वुरी वान जह मान की ॥ [1]
नैंक वंक भृकुटि देखत मोहि सुधि न रहत निजु प्राण की ।
तन मन वारि विहारिनि सांची आस एक मुसिक्यान की ॥ [2]
मुख रूख्यौ घूंटन चाहन वस अधर सुधा के पान की ।
श्री रामराय स्वामिनी हृदय में अति उदार कुल कान की ॥ [3]
- श्री रामराय जी, आदिवाणी (36)
श्रीकृष्ण श्रीराधा से कहते हैं, “हे प्यारी जू! आपकी यह मान करने की आदत मेरे लिए अत्यंत कष्टदायक है”। [1]
यदि आपकी थोड़ी सी भी टेढ़ी भौंहें देख लेता हूँ, तो मेरे प्राण अति व्याकुल हो उठते हैं, अपनी सुधि-बुधि खो बैठता हूँ । मैं सत्य कहता हूँ, आपकी एक मुस्कान की आशा पर मैं अपने तन और मन को पूर्णतः न्योछावर कर सकता हूँ। [2]
परंतु आपका मुख अब भी रूठा हुआ है, और उस पर आपने घूँघट डाल रखा है। मुझे आपके अधर सुधा रूपी प्रसाद का पान करने की प्रबल इच्छा है। हे रामरायजी की स्वामिनी! आप तो हृदय से अति उदार हैं और अपने कुल की शिरोमणि हैं। कृपा करके अपने मान को त्याग दें। [3]

