(राग जै-जैवंती)
वृंदावन बंसीवट जमुना-तट बंसी रट,
रास में रसिक प्यारो खेल रच्यौ वन में । [1]
राधा-माधो कर जोरैं, रवि-ससि होत भौरें,
मंडल में निरतत दोऊ सरस सघन में॥ [2]
मधुर मृदंग बाजै, मुरली की धुनि गाजै,
सुधि न रही री कछु, सुर, मुनि, जन में॥ [3]
‘नंददास’ प्रभु प्यारो, रूप-उजियारो अति,
कृष्ण-क्रीड़ा देखि भये थकित जन मन में॥ [4]
- श्री नंददास, श्री नंददास ग्रंथावली, पदावली (122)
यमुना के तट पर, बंसीवट की शीतल छाया में, बांसुरी की मधुर ध्वनि गूँज रही है। रसिक श्रीकृष्णचंद्र ने वन में रास लीला का दिव्य आयोजन रचा है। [1]
राधा और माधव हाथों में हाथ डाले खड़े हैं, सूर्य और चंद्रमा मानो उनकी छवि पर मोहित होकर भँवर से प्रतीत हो रहे हैं। रास मंडल में, सघन कुंजों की गोपनीयता में, वे दोनों मधुर नृत्य कर रहे हैं। [2]
मृदंग की मधुर ध्वनि वातावरण को संगीतमय कर रही है, और बांसुरी की तान हर दिशा में गूँज रही है। देवता, ऋषि, और भक्तगण सभी अपनी सुध-बुध खोकर उस आनंद में डूब गए हैं। [3]
श्री नंददास जी कहते हैं कि मेरे प्रभु श्रीकृष्णचंद्र अपने उज्ज्वल स्वरूप से अद्भुत शोभा बिखेर रहे हैं। उनकी लीला को देखकर सभी के मन मोह और आनंद में पूर्णतः डूब गए हैं। [4]
वृंदावन बंसीवट जमुना-तट बंसी रट,
रास में रसिक प्यारो खेल रच्यौ वन में । [1]
राधा-माधो कर जोरैं, रवि-ससि होत भौरें,
मंडल में निरतत दोऊ सरस सघन में॥ [2]
मधुर मृदंग बाजै, मुरली की धुनि गाजै,
सुधि न रही री कछु, सुर, मुनि, जन में॥ [3]
‘नंददास’ प्रभु प्यारो, रूप-उजियारो अति,
कृष्ण-क्रीड़ा देखि भये थकित जन मन में॥ [4]
- श्री नंददास, श्री नंददास ग्रंथावली, पदावली (122)
यमुना के तट पर, बंसीवट की शीतल छाया में, बांसुरी की मधुर ध्वनि गूँज रही है। रसिक श्रीकृष्णचंद्र ने वन में रास लीला का दिव्य आयोजन रचा है। [1]
राधा और माधव हाथों में हाथ डाले खड़े हैं, सूर्य और चंद्रमा मानो उनकी छवि पर मोहित होकर भँवर से प्रतीत हो रहे हैं। रास मंडल में, सघन कुंजों की गोपनीयता में, वे दोनों मधुर नृत्य कर रहे हैं। [2]
मृदंग की मधुर ध्वनि वातावरण को संगीतमय कर रही है, और बांसुरी की तान हर दिशा में गूँज रही है। देवता, ऋषि, और भक्तगण सभी अपनी सुध-बुध खोकर उस आनंद में डूब गए हैं। [3]
श्री नंददास जी कहते हैं कि मेरे प्रभु श्रीकृष्णचंद्र अपने उज्ज्वल स्वरूप से अद्भुत शोभा बिखेर रहे हैं। उनकी लीला को देखकर सभी के मन मोह और आनंद में पूर्णतः डूब गए हैं। [4]

