दया प्रेम प्रगटयौ तिन्हैं तन की तनि न संभार - श्री दयाबाई

दया प्रेम प्रगटयौ तिन्हैं तन की तनि न संभार - श्री दयाबाई

दया प्रेम प्रगटयौ तिन्हैं, तन की तनि न संभार ।
हरि रस में माते फिरैं, गृह बन कौन बिचार ॥

- श्री दयाबाई (शुक संप्रदाय के श्री चरण दास जी की शिष्या)

जिनके हृदय में प्रेम प्रकट हो जाता है, वे अपने शरीर की सुध-बुध खो बैठते हैं । उनकी समस्त वृत्तियाँ अंतर्मुखी हो जाती हैं, और उनके लिए घर तथा जंगल का कोई भेद नहीं रह जाता।