देव हू भये तै कहा - श्री सुंदर जी

देव हू भये तै कहा - श्री सुंदर जी

(कवित्त)
देव हू भये तै कहा, इंद्र हू भये तै कहा,
विधि हू कै लोक तै बहुरि आइयतु है । [1]
मानुष हू भये तै कहा, भूपति भये तै कहा,
द्विज हू भये तै कहा पार जाइयतु है ॥ [2]
पशु हू भये तै कहा, पखी हू भये तै कहा,
पन्नग हू भये ते कहा क्यौं अघाइयतु है । [3]
छुटिबे कौं ‘सुन्दर’ उपाइ एक साधु संग,
जिनकी कृपा अति सुख पाइयतु है ॥ [4]

- श्री सुंदर जी

यदि कोई देवता बन जाए, या स्वर्ग के राजा इंद्र का पद प्राप्त कर ले, तो इसमें क्या विशेष है? क्योंकि यह तो मायिक एवं क्षणिक है। विधि के विधान के अनुसार, उसे दोबारा मृत्यु लोक में लौटना ही पड़ेगा। [1]

यदि कोई मनुष्य जन्म ले और राजा भी बन जाए, तो भी उसका क्या लाभ?
यदि वह ब्राह्मण भी हो जाय, परंतु इस संसार रूपी महासागर को पार न कर सका, तो उसका जीवन व्यर्थ है। [2]

पशु, पक्षी, या सर्प बन जाना भी व्यर्थ ही है, यदि वह अपनी आत्मा की भूख—परम सत्य को जानने की लालसा—को तृप्त न कर सका। [3]

श्री सुंदरदास जी कहते हैं, इस संसार सागर से मुक्ति का एकमात्र उपाय है, किसी वास्तविक संत का संग। उनकी कृपा से ही जीव अपने वास्तविक सुख—परमात्मा—को प्राप्त कर सकता है। [4]