मो मन कब अनुरागिहै - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय श्रृंगार शतक (120)

मो मन कब अनुरागिहै - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय श्रृंगार शतक (120)

मो मन कब अनुरागिहै, जुगुल कमलपग तीर ।
ज्यों प्यासे की लालसा, निर्मल सीतल नीर ॥

- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय श्रृंगार शतक (120)

जिस प्रकार एक प्यासा व्यक्ति निर्मल और शीतल जल की लालसा में व्याकुल हो उठता है, उसी प्रकार कब मेरे मन में भी दिव्य दंपति श्री राधा-कृष्ण के युगल चरणों के प्रति वैसा ही अनुराग और व्याकुलता उत्पन्न होगी?