(सवैया)
कोऊ विद्या विधि वेद बँध्यौं बल, कोऊ धन धर्म कर्म कृत पास। [1]
कोऊ जम नेंम कोऊ ब्रत संजम, कोऊ जप तप कोऊ भ्रमत उदास॥ [2]
कोऊ कार्तिक अगहन मकर सीत, सहि कोऊ बैसाखीग्यास उपास। [3]
संतत सुखद बिहारिनिदास कैं, श्रीहरिदास से श्रीहरिदास॥ [4]
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (20)
कोई तो विद्या, वेद, विधि-विधान में, कोई धन, धर्म, कर्मकांड आदि कार्यों के जाल में जकड़े हुए हैं। [1]
कोई यम-नियम, संयम-व्रत तथा जप-तप आदि में, तो कोई-कोई उदासीन पथ में ही भटकते रहते हैं। [2]
कोई कार्तिक, अगहन, मकर संक्रांति की शीत का ही सेवन करते हैं। कोई बैसाखी, निर्जला एकादशी आदि व्रतों का पालन करते रहते हैं। [3]
इन समस्त कष्टप्रद साधनों से अति दूर, संतत सुखदाई और सर्वोपरि नित्य-विहार के उपदेष्टा केवल स्वामी श्री हरिदास जी महाराज ही हैं। [4]
कोऊ विद्या विधि वेद बँध्यौं बल, कोऊ धन धर्म कर्म कृत पास। [1]
कोऊ जम नेंम कोऊ ब्रत संजम, कोऊ जप तप कोऊ भ्रमत उदास॥ [2]
कोऊ कार्तिक अगहन मकर सीत, सहि कोऊ बैसाखीग्यास उपास। [3]
संतत सुखद बिहारिनिदास कैं, श्रीहरिदास से श्रीहरिदास॥ [4]
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (20)
कोई तो विद्या, वेद, विधि-विधान में, कोई धन, धर्म, कर्मकांड आदि कार्यों के जाल में जकड़े हुए हैं। [1]
कोई यम-नियम, संयम-व्रत तथा जप-तप आदि में, तो कोई-कोई उदासीन पथ में ही भटकते रहते हैं। [2]
कोई कार्तिक, अगहन, मकर संक्रांति की शीत का ही सेवन करते हैं। कोई बैसाखी, निर्जला एकादशी आदि व्रतों का पालन करते रहते हैं। [3]
इन समस्त कष्टप्रद साधनों से अति दूर, संतत सुखदाई और सर्वोपरि नित्य-विहार के उपदेष्टा केवल स्वामी श्री हरिदास जी महाराज ही हैं। [4]

