जग उपहासन सौं राखत न काज कछू - श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (235)

जग उपहासन सौं राखत न काज कछू - श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (235)

(कवित्त)
जग उपहासन सौं राखत न काज कछू,
नारदादि भक्तन की सुधि सम्हारै ना। [1]
सुबलादि सखन कौं भेटत न देख्यौ कहूँ,
नंद औ जसोदा कौ सनेह मन धारै ना॥ [2]
जानत पै प्रेम सीम मधुर रस सुधा की,
सागर अगाधा राधा नैनन सौं टारै ना। [3]
ताही सौं विहारै नव कुञ्ज सघन वीथिन में,
नागर रसिक दूजी ओर हू निहारै ना॥ [4]
- श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (235)

सृष्टि-रचना आदि की बात तो दूर रही, निकुंजेश्वर श्रीकृष्ण अपने नारद आदि भक्तों को भी नहीं पहचानते। [1]

श्रीदामा आदि मित्रों से नहीं मिलते तथा अपने माता-पिता के स्नेह को भी बढ़ावा नहीं देते। [2]

उनका हृदय और दृष्टि तो केवल श्री राधा पर ही केंद्रित रहती हैं, जो प्रेम की परमावधि स्वरूपा तथा मधुर रस रूपी अमृत-सिन्धु की एकमात्र सार हैं। [3]

उन श्री राधा का ही एक मात्र आश्रय लेते हुए वे (श्री श्यामसुंदर) निरंतर कुंज गलियों की उपासना करते रहते हैं जिनमें श्री राधा के चरण पड़े हैं। [4]