आरति करत श्री ललित कुँवरि की - श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (115)

आरति करत श्री ललित कुँवरि की - श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (115)

आरति करत श्री ललित कुँवरि की।
कोटि भानु दुति रूप सुंदरि की॥ [1]
राजत कनक सिंहासन स्यामा।
अद्भुत रूप अनूपऽभिरामा॥ [2]
सारंगी बीन प्रबीन बजावैं।
पदगति नूपुर सुरनि मिलावैं॥ [3]
प्रेम मुदित अलि चँवर दुरावैं।
जय जय शब्द पुहुप बरसावैं॥ [4]
अङ्गनि दुति फैली बन जोती।
पत्र फूल मनों कुन्दन दोती॥ [5]
निरषि निरषि अँग अङ्ग निकाई।
अलबेली अलि बलि बलि जाई॥ [6]
- श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (115)

श्री ललिता आदि सखियाँ मनोहारिणी कुँवरि श्री राधा की आरती कर रही हैं, जिनके रूप-सौंदर्य की आभा करोड़ों सूर्य के समान उज्ज्वल है। [1]

श्री श्यामा जू स्वर्ण के सिंहासन पर विराजमान हैं, जिनके अद्भुत रूप-सौंदर्य की कोई उपमा संसार में नहीं मिलती। [2]

सखियाँ बड़ी प्रवीणता के साथ सारंगी और बीन बजा रही हैं। कुछ सखियाँ ताल देते हुए पदगति से नृत्य कर रही हैं, जिनके नूपुरों की मधुर ध्वनि स्वर-से-स्वर मिला रही है। [3]

कुछ सखियाँ बड़े प्रेम और प्रसन्नचित्त होकर चँवर डुला रही हैं, और कुछ सखियाँ श्री राधा की जय-जयकार करते हुए उन पर पुष्प बरसा रही हैं। [4]

श्री राधा की अंग-कांति चारों ओर इस प्रकार फैली हुई है कि पूरा वन प्रकाशित हो उठा है, और पत्र-पुष्प मानो कुन्दन की तरह चमक रहे हैं। [5]

श्री अलबेली अलि कहती हैं, “श्री राधा के अंग-अंग को निहारते हुए मैं बार-बार उन पर बलिहारी जा रही हूँ।” [6]