निसिदिन बरसत नैन हमारे - श्री सूरदास, सूर सागर

निसिदिन बरसत नैन हमारे - श्री सूरदास, सूर सागर

निसिदिन बरसत नैन हमारे।
सदा रहत पावस ऋतु हम पर, जबते स्याम सिधारे॥ [1]
अंजन थिर न रहत अँखियन में, कर कपोल भये कारे।
कंचुकि-पट सूखत नहिं कबहुँ, उर बिच बहत पनारे॥ [2]
आँसू सलिल भये पग थाके, बहे जात सित तारे।
'सूरदास' अब डूबत है ब्रज, काहे न लेत उबारे॥ [3]
- श्री सूरदास, सूर सागर

मेरे नेत्रों से दिन-रात निरंतर आँसू बहते रहते हैं, मानो श्यामसुंदर के प्रस्थान के बाद वर्षा ऋतु का सदा के लिए आगमन हो गया हो। [1]

मेरी आँखों में काजल टिक नहीं पाता, आँसुओं में बहकर मेरे कपोल और हाथों को भी काला कर देता है। मेरी कंचुकी और वस्त्र कभी सूखते नहीं, क्योंकि मेरा हृदय निरंतर आँसुओं से भरा रहता है। [2]

इन निरंतर बहने वाले आंसुओं के कारण हमारी यह देह जल का स्त्रोत बन गई है, जिसमें से जल सदैव रिसता रहता है।श्री सूरदास कहते हैं, "पूरा ब्रज आँसुओं में डूब चुका है, हे श्री कृष्ण, अब यहाँ आकर इसे क्यों नहीं बचा लेते?" [3]