प्रीतम हू कैं प्रन इहै, प्रीति के बस ह्वै जाहिं।
कोटि धर्म किन करौ कोउ, तिन तन चितवत नाहिं॥
- श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, मन शिक्षा लीला (57)
प्रियतम श्री लाल जी (श्री कृष्ण) की यही प्रतिज्ञा है कि वे सदा प्रेम के वशीभूत ही रहते हैं, किन्तु प्रेम से विहीन कोटि-कोटि धर्माचरण करने वालों की ओर दृष्टि उठा कर भी नहीं देखते ।
कोटि धर्म किन करौ कोउ, तिन तन चितवत नाहिं॥
- श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, मन शिक्षा लीला (57)
प्रियतम श्री लाल जी (श्री कृष्ण) की यही प्रतिज्ञा है कि वे सदा प्रेम के वशीभूत ही रहते हैं, किन्तु प्रेम से विहीन कोटि-कोटि धर्माचरण करने वालों की ओर दृष्टि उठा कर भी नहीं देखते ।

